विगत कुछ दिनों से राजनीतिक विचारों और राष्ट्रीय समाचारों पर अधिक टिपण्णी करने से बचता रहा हूँ. तमाम घटनाएं हुईं जो मन को विचलित करने वाली हैं. अपने मोहल्ले के बाहर की मेन रोड की खस्ता हालत से ले कर पद्मावती पर मची चिल्लम चोट, एक अस्पताल द्वारा नवजात जीवित शिशु को प्लास्टिक बैग में भरकर मृत घोषित करने की घटना, राहुल गाँधी द्वारा तर्कपूर्ण त्रुटिरहित बातें किये जाने का अचम्भा, प्रधानसेवक श्री नरेन्द्र मोदी जी का चुनाव प्रचार में साप्ताहिक रोना, राजस्थान में नफरत से ग्रस्त एक व्यक्ति द्वारा दुसरे की हत्या और जलाया जाना, ऐसे तमाम मौके थे जब कुछ कह सकूँ पर नहीं कहा. उम्मीद है कि समय के साथ कुछ सुधरेगा परन्तु हालात बद से बदतर हो रहे हैं. ये किसी पार्टी या किसी नेता की गलती नहीं है. पार्टियाँ तो शायद नेहरु-शास्त्री के ज़माने के बाद से ही अपनी प्रासंगिकता खो चुकी हैं. कुछ समय अटल और कुछ समय अरविन्द-योगेन्द्र-कुमार जैसे लोगों के चलते फिर एक समय लौटता है और फिर गुम हो जाता है. आज जो भारत में हो रहा है ये पूरे के पूरे समाज की विफलता है. और इस विफलता में सबसे बड़ा योगदान है उस इन्टरनेट के कायर अनपढ़ों की फ़ौज का जो तर्क के इस्तेमाल से पूर्णतः परहेज़ रखती है. हर पार्टी में एक समुदाय है जिसके लिए हर मुद्दे का एक ही तर्क है- मोदी, राहुल, हिन्दू, मुस्लिम, यादव, दलित, महादलित आदि आदि.
 
किसी को 2011 से 2014 का समय याद हो तो ज़रा गौर करें. राष्ट्रीय मीडिया और चौराहों पर चिंतन के विषय क्या थे? भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून हो या नहीं? मुख्यमंत्री प्रधानमन्त्री लोकपाल के दायरे में हों या नहीं? राईट टू रिकॉल, राईट टू रिजेक्ट हो या नहीं? कामनवेल्थ घोटाले वालों को सज़ा होनी चाहिए, लाल बत्ती ख़त्म होनी चाहिए आदि. उस समय सबसे बड़ी चर्चाएँ आपस में हो रही थीं. किसी धर्म पार्टी के समुदाय के बीच असुरक्षा का भाव इतना प्रबल नहीं था जितना अब है. एक समाज के रूप में हम ये चर्चा भी करने लगे थे कि ऐसा क़ानून होना चाहिए जो साम्प्रदायिक भाषण देने वाले उम्मीदवारों पर आजीवन चुनाव लड़ने एवं किसी सरकारी पद पर आने से प्रतिबंधित कर सके. अब ज़रा 2014 के बाद का समय याद कीजिये. भारत के सबसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री खुले तौर पर साम्प्रदायिक बयान कईयों बार दे चुका है और हमारी मीडिया उनके इंटरव्यू से पैसा कमाने के लालच में उनके स्वागत सत्कार में जुटी है. हमारे राष्ट्रीय बहस के बिंदु किस स्तर पर आ रहे हैं. एक कुशल षड्यंत्रकर्ता की तरह काम करता हुआ चंद लोभी नेताओं, उद्योगपतियों, भ्रष्टों और पत्रकार-रुपी दलालों का एक गुट है जो चाहता है कि हम कभी टीपू सुल्तान तो कभी पद्मावती पर उलझे रहें. हमें सड़क के गड्ढे कम और प्लेटों का खाना ज़्यादा दिखे. दोनों प्रमुख समुदायों के हितैषी दिखने की होड़ में एक सोच के लोग एक समुदाय को वीरता का झूठा एहसास देना चाहते हैं और दूसरी सोच के लोग दुसरे समुदाय को घोर असुरक्षा का झूठा विश्वास दिलाना चाहते हैं. इस सब में सबसे बड़ी विफलता एक समाज के रूप में हमारी ये रही है कि हम एक बार फिर सड़कों पर निकलना भूल गए हैं. मात्र 6 सालों में इतनी गिरावट की राजनीतिक पार्टियाँ पेट्रोल के दाम से ज्यादा पद्मावती पर बाहर आ रही हों. सर काटने पर ईनाम की घोषणा जो नेता कर रहे हैं उन्हें पार्टियों से निकाला तक नहीं जा रहा और हम बर्दाश्त कर रहे हैं. शहरों में पोस्टर टाँगे जा रहे हैं कि चाइना के माल का बहिष्कार करो जबकि भारत की उत्पादन क्षमता पर नज़र डालें तो एक बड़ा शून्य दिखाई पड़ता है. उत्पादन क्षमता बढाने से विकास होगा, न कि बहिष्कार से. हर मुद्दे का एक ही अंत हो रहा है- पाकिस्तान, चाइना, भारतीय सेना का विरोधी, भारत के दुश्मन या धर्म के दुश्मन या जाति के दुश्मन.
 
अन्ना आन्दोलन के समय किसी ने एक बात कही थी. जिसे ये समझ ही नहीं आ रहा कि सही क्या और गलत क्या वो दोषी नहीं है. परन्तु जिसे ये समझ आ रहा हो कि क्या गलत हो रहा है और वो सच के साथ नहीं खड़ा हो, या बड़ी लड़ाई छोड़ कर आपस में छोटी लड़ाइयाँ लड़ने लगें उनसे बड़ा दोषी कोई और नहीं. ये बात आज चरितार्थ होती नज़र आ रही है. हिन्दुस्तान की ख़ूबसूरती हिन्दुस्तान की एकता है. सबसे बड़े राष्ट्रभक्त होने का दावा करने वाले लोग यदि आपसे ये कहें कि हिन्दुस्तान बिखरने वाला है तो यकीन कर लीजियेगा कि ये केवल एक ठग हैं जो आपकी असुरक्षा की भावना का लाभ लेना चाहते हैं. हिन्दुस्तान एक विचार है. और जब तक यहाँ गाँधी, भगत, आज़ाद, नेहरु, सुभाष, अम्बेडकर को पढ़ने वाले जिंदा हैं तब तक हिन्दुस्तान बाँटा नहीं जा सकता. ये सभी एक दुसरे के अलग अलग समय पर विरोधी रहे, परन्तु एक बात पर इनकी अटल एकता थी. गुलामी से आज़ादी और हिन्दुस्तान में सभी धर्मों की एकता. अपनी सोच को मोदी राहुल अरविन्द हिन्दू मुस्लिम का गुलाम मत होने दीजिये. आपको तय करना है कि इन क्षण भर के बुलबुलों के रास्तों पर चलेंगे या अथाह सागर जैसी सोच और आकाश भर बलिदान करने वाले हिन्दुस्तान के उन वीर क्रांतिकारियों की.
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How she was made…

Posted: October 27, 2017 in Youth-Naama

चाँद की इक जेब फटी थी

चांदी बन कर बहा था कुछ

उसके हुस्न में आ बैठा…

तुम्हें लगभग कुछ नहीं मालूम। कॉलेज के चार साल तुम किस तरह मेरे ज़ेहन पर हावी रही, तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं है। नर्मदा नदी के पास तिलवारा वाले ढ़ाबे पर जहाँ मैं और दो दोस्त अक्सर पिया करते थे, वहाँ भी तुम्हें सोचा गया है। तुम्हें दूर से देख लेने की खुशी वहीं मेरे चेहरे पे झलकी होगी, तभी दोनों नालायक दोस्त समझ जाते थे। तुम्हें किसी और से बात करते देख लेने पर भी जो दिल उतरता था, वो भी समझ जाया करते होंगे। ऐसे दिनों में बात निकलवाने के चक्कर में मुझे एक्स्ट्रा पिलाई जाती थी। पी कर मैं और मेरे दोस्त मिलकर उस लड़के को भी जी भर के कोसते थे जिससे बात करती हुई तुम अक्सर दिखती थी। कॉलेज में तुमने मेरे साथ बहुत कम समय बिताया पर मैनें तुम्हारे साथ खूब समय बिताया है। वो ऐसे कि कई बार तुम अपने ग्रुप के साथ आगे चलती रही और मैं बेमतलब ही दस बीस फुट पीछे चलते चलते तुम्हारी क्लास तक हो आया। तुम्हारी गाड़ी के पीछे पीछे बाईक चलाने का एक्सपीरियंस ही अलग था। दरअसल जबसे तुम यहाँ से गई मैनें अपनी बाईक नहीं चलाई। साल भर में दो बार तुम आईं सो खुद धो धा कर हमने बाईक भी निकाल ली। वरना बाईक खड़े खड़े सड़ रही थी। अब तो बाईक बिक चुकी है। दोनों आगे बढ़ चुके हैं। फिर भी मेरे इश्क के बेहतरीन पलों की गवाही तिलवारा वाले ढ़ाबे की प्लेटें, आईबी की बोतल और मेरे दोस्तों की गालियाँ दे सकती हैं। हालाँकि अब दोस्त बाहर हैं, ढ़ाबे भी नहीं जाता, आईबी पीने का तो सवाल ही नहीं। फिर भी इश्क में कही गईं तमाम शायरी का किस्सा तिलवारा की हवा सुना सकती है, कॉलेज से ढ़ाबे तक की सड़क सुना सकती है। तुम नहीं। तुम्हें लगभग कुछ नहीं मालूम।

मैं उसे जाते हुए देख रहा था, मन में आटोमेटिक अरिजीत की आवाज़ गूंजी…ओ रे लम्हे, तू कहीं मत जा, हो सके तो उम्र भर रुक जा…पिछले एक सवा घंटे से हम साथ थे..वो शहर छोड़ कर जा रही थी..ये आईटी सेक्टर वाली कम्पनियां बड़ी वाहियात किसम की होती हैं…पेशेवर होने के नाम पर एक जॉइनिंग लैटर नाम का परमाणु हथियार भेज दिया जाता है…ये भला क्या बात हुई कि 15-20 हज़ार रूपये की नौकरी के लिए दस दिन में किसी का शहर बदलवा दो..हम रोज़ नहीं मिलते थे..सच कहा जाए तो मिलते ही नहीं थे..पर वो थी..मैं था..घूमने को एक शहर पड़ा था.. अब अचानक मेन रोड से अलग रस्ते उसके घर वाली गली से होते हुए निकलने का कोई मतलब नहीं रहने वाला.. दोस्तों के साथ मॉल में घूमते हुए उससे टकरा जाने की व्यर्थ उम्मीद नहीं रहने वाली…नज़रें नहीं घुमा पाऊंगा, कि शायद वो वेस्टसाइड में अपनी मम्मी के साथ कपड़ों का कलेक्शन देखती हुई मिल जाए.. अब किसी कॉमन फ्रेंड की पार्टी में जाने से पहले मैं लुक्स को लेकर घबराने नहीं वाला… दस दिनों में ऐसी दस हज़ार चीजें बदल जाने वाली थीं..और मेरी घबराहट चरम पर थी…
 
उससे इन दस दिनों में भी नहीं मिल पाया…उसे बिना मिले नहीं जाने दे सकता..आखिर हम बॉलीवुड प्रेमी रोमांटिक फिल्में देख कर बड़े होते हैं… सो जब वो ट्रेन से निकली तो बिना सामान के मैं भी 3 डब्बे दूर स्लीपर में चढ़ लिया..ट्रेन के चलते ही उसे बुला कर एसी और स्लीपर के बीच की शटर खुलवाई.. और अगले स्टेशन तक उसकी आँखें देख पाने की हसरत जी भर कर पूरी की..रोज़ लेट होने वाली ट्रेन आज डबल स्पीड से भागती हुई महसूस हुई… भारतीय रेल को मेरी मुहब्बत से जाने क्या समस्या थी..
 
“जाना ज़रूरी है??” बस इतना पूछ पाया..”मुझे एक बार जॉब कर के देखनी है..अच्छी नहीं लगेगी तो वापस आ जाउंगी..”(शायद उसे जॉब अच्छी लग गयी हो) इसके सिवाय दोनों के पास कुछ ख़ास कहने को नहीं था..बस चुपचाप देखते रहे..साथ थे..इस एक सवा घंटे ने मुझे उसे देखते रहने की लत सी लगा दी…मैं तमाम ख्वाइशों से इतर सिर्फ उसके आस पास, उसके साथ रहना चाहता था..इस ख्वाइश का गला घोंट कर अगले स्टेशन पर उतरना पड़ा..ट्रेन भी 2 मिनट के स्टॉपेज के बाद चल दी.. मैं उसे जाते हुए देख रहा था, मन में आटोमेटिक अरिजीत की आवाज़ गूंजी… ओ रे लम्हे…

freedom-is-not-worth-having-if-it-does-not-include-the-freedom-to-make-mistakes-mahatma-gandhiआज की सुबह थोड़ी अनप्रेडिक्टेबल सी रही. एक तो मैं कभी इतनी सुबह उठता नहीं, पर आज 5:30 बजे ही हल्का नाश्ता हो चुका है..स्वीडन के एक फुटबॉलर के कुछ गोल्स का आधा विडियो बंद किया..अचानक जैसे बिना दिमाग में आये उँगलियों ने खुद ही गूगल किया- साबरमती के संत ऑडियो.

अच्छा गाना है, अन्ना आन्दोलन के समय सुबह मंच पर मेरे संचालन शुरू करने से पहले कुछ साथी एक सीडी बजा दिया करते थे, उसमें भी था.

दे दी हमें आज़ादी, बिना खड़ग, बिना ढाल
साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल

पहली लाइन सुनते ही सोचने पर मजबूर हूँ. गांधी की यही विशेषता मुझे सबसे अधिक अचंभित करती है, वो सोचने पर मजबूर करते हैं.वो अप्रासंगिक नहीं होते. गांधी हर मुद्दे पर आज भी प्रासंगिक हैं. ताज़ा ताज़ा प्रकरण चल रहे हैं. जेएनयू में जो भारत विरोधी नारे लगे, उसके पहले रोहित वेमुला व् अन्य साथियों के साथ जो सुलूक हुआ, उसके कुछ ज्यादा समय पहले कश्मीर में शपथ ग्रहण में मुख्यमंत्री ने पाकिस्तान एवं भारत विरोधी हुर्रियत नेताओं को शांतिपूर्ण चुनावों का श्रेय दिया. बहरहाल, अभी लेटेस्ट बवाल जेएनयू पर मचा हुआ है..

कुछ 20-30 लोगों ने भारत के विरोध में नारे लगाये, और बाकी फेसबुक और ट्विटर की जनता ने युद्ध छेड़ दिया. शाम तक अर्नब गोस्वामी से लेकर अंजना ओम कश्यप तक सभी ने 4-5 लोगों को इकठ्ठा कर बहस शुरू करा दी. बस जैसे बहस ख़त्म होते ही सारे भारत विरोधी भी ख़त्म हो जायेंगे. एक तरफ के लोगों का तर्क है कि देशद्रोह का आरोप लगा कर गिरफ्तारी ज्यादती है, दूसरी तरफ के लोग कुछ और सुनना ही नहीं चाहते, या तो भारत विरोधियों को पाकिस्तान अभी भेजो या तुम भी चले जाओ उनके साथ.

मेरा निजी विचार है कि भारत विरोधी नारे लगाने वालों को ढूंढो और जेल में डालो. परन्तु इस आड़ में कुछ लोग यदि भारतीय होते हुए और भारत से प्रेम रखते हुए भी एक बड़े तबके के विचारों से सहमत नहीं है तो उन्हें तरह तरह की उपाधियों से नवाजना किस हद तक ठीक है? एंटी नेशनल, सिकुलर, पाकिस्तानी, आतंकवादी,   इसके नीचे तो कोई बात भी नहीं करना चाहता. बात ठीक है, भारत के सबसे बड़े संस्थानों में से एक में ऐसा हुआ है, भारत विरोधी नारे लगे हैं, इससे भारत का अपमान हुआ है. शिक्षा मंत्री कहती हैं भारत का अपमान करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा, मेरा इस बात को पूरा समर्थन है. परन्तु फिर कश्मीर में पीडीपी के साथ भारत कैसे मजबूत हो रहा है? फिर ये भी बताएं, कि निहालचंद जिन पर सामूहिक बलात्कार का आरोप है उसे मंत्री बना कर भारत का कौनसा सम्मान बढ़ रहा है? क्या बिना राजनीतिक आंकलन के हम भारत के विरोधियों को ख़त्म करने के लिए तैयार हैं?

खैर, अचानक आज ख्याल आया कि बापू होते तो क्या करते? गाँधी हिन्दुस्तानी राजनीति के लिटमस टेस्ट की तरह लगते हैं… सोचिये, क्या गांधीजी इन छात्रों पर कार्यवाही की मांग करते? वो भी देशद्रोह के आरोप में? क्या बापू केजरीवाल की चप्पल और मोदी के सूट पर बहस करते या निहालचंद/योगी आदित्यनाथ के संसद में होने से समाज को क्या दिशा मिलेगी इस पर? क्या बापू आज के समाज को असहिष्णु कहते? अवार्ड वापस करते? शायद नहीं. शायद बापू वही करते जो आज़ादी के दिन किया था.. देश के किसी कोने में भड़कती आग को बुझा रहे होते.. लड़ रहे लोगों से लड़ना छोड़ कर प्रेम का सन्देश दे रहे होते..शायद बापू एनडीटीवी या टाइम्स नाउ पर नेशन वांट्स टू नो का जवाब देने के बजाय भोज नगर, मध्य प्रदेश के हालात पर चिंता होते… या शायद शहीद हनुमंतप्पा के गाँव में कुछ हफ़्तों के लिए रहने चले जाते…

आप आज भी समय से आगे चल रहे हैं बापू…आप लोगों को समझ नहीं आते.. या तो अब तक आपको कुछ चेक आ गए होते, ओबामा से सूट पहन के मिलने की खातिर, या आपका समझौता एक्सप्रेस का टिकेट कटवा दिया गया होता… अच्छा है, आप पहले चले गए..यदि संभव हो तो किसी तरह प्यार का सन्देश लोगों तक पहुंचा दें… हर मुद्दे पर लडें, जो गलत लगे उस पर लडें.. बस धर्म के नाम पर ना लडें, जाति के नाम पर ना लडें, और ना लड़वाने वालों को माफ़ करें… यदि हो सके, तो मोहनदास करमचंद गाँधी एक और जन्म ले कर आयें… जबलपुर घुमने आइये, उम्मीद है तब भी पोहा जलेबी और चाय अच्छी ही मिलेगी..

Image  —  Posted: February 13, 2016 in Gyaan-Kendra

पिछले कुछ दिनों से तुम लगातार पूछ रही हो कि क्या मैं तुमसे प्यार करता हूँ… दरअसल तुम ये पूछना चाह रही हो कि क्या जो मैं करता हूँ वही प्यार है?? जितना कुछ अपने आजू बाजू वालों को प्यार के बारे में कहते सुना था, उन सबको जो प्यार का ज़िक्र करते हुए खुश होते थे….इतना सब सुनने के बाद आज जब मुझे जान रही हो तो ये प्यार उस सुने हुए प्यार जैसा क्यों नहीं है?? जो मैं तुम्हें करता हूँ अगर वही प्यार है तो ये उतना प्यारा लगता क्यों नहीं?? मुझे भी तुम्हारी मुश्किलें हर दफे समझ तो आ रही हैं पर उनका हल निकालने में लगातार फेल हो रहा हूँ…पास हो जाने की चाहत के कारण इस बार फेल होना इंजिनीयरिंग के किसी भी सेमेस्टर से ज़्यादा दुखदाई है…मैं भी अन्दर ही अन्दर वाकिफ हूँ कि अंततः शायद इस परीक्षा में मैं ही टॉप करूँ…परन्तु टॉप करने के बाद भी सप्लीमेंट्री देना पड़ा था ये बात चुभेगी… तुम्हें मेरे सप्लीमेंट्री अटेम्प्ट से उतना फर्क नहीं पड़ता क्यूंकि तुम मुझे सिर्फ आखिर में टॉप करते देखना चाहती हो…मेरी सुई है कि सप्ली आ जाने पर ही अटकी है…अगला अटेम्प्ट देना ही नहीं चाहता क्यूंकि इस इम्तिहान में कभी फेल होने की गुंजाइश लेकर नहीं चला था…अब जब हो चुका हूँ तो बाकी बातें निरर्थक लगती हैं…काश ये प्रेम विभाग बिहार सरकार के अंतर्गत आता…सप्ली आने से बच सकती थी…

कुछ महीनों बाद कुछ ठीक ठाक सा सोच पाया हूँ.. घटनाक्रम अर्धसत्यों का मिश्रण है..

इश्क भुलावा- 4

तुम्हें किताब पढनी चाहिए- लड़कियों से कैसे बात करें…
ऐसा कुछ नहीं है, मुझे लड़कियों से बात करना आता है..कईयों से जब चाहूँ घंटों बात कर सकता हूँ मगर मन नहीं होता…
रहने तो दो, ये तक तो याद होता नहीं कि 2 घंटे पहले मिले थे तो सूट कौनसा था..
हाँ तो….मिले भी तो 1 घंटे बस थे… इतने में आँखें देखूं या सूट.. पर इसमें लड़कियों से बात करने का पॉइंट कहाँ से आया…
मुझसे बात करने में इतना अनकम्फर्टेबल क्यूँ हो जाते हो..
मैं कहाँ अनकम्फर्टेबल हुआ…
और नहीं तो क्या…बड़े शायर बने फिरते हो, कौनसा शायर दोपहर के 12 बजे सामने खड़े हो कर गुडनाईट बोलता है…
अब तुम्हें मेसेज पे रोज़ बोलने की आदत है न…

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चेहरे पर कपड़ा बंधा हुआ है, सिर्फ आँखें दिख रही हैं…या तो मन ही मन उसे मैं क्यूट लग रहा हूँ या अजीब…क्यूट और अजीब में से मैं क्यूट साबित होना चाहता हूँ…आखिर में ऐसा क्या बोलूं जो उसे भा जाए… तय कर पाने के पहले ही स्कूटी आगे बढ़ कर आँखों से ओझल हो गयी…